Success Story Of IAS Topper K Lalith

By | November 25, 2020

Success Story Of IAS Topper K Lalith: मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है. कुछ ऐसी ही मिसाल पेश करते हैं हमारे आज के आईएएस ललित. देख न पाने के बावजूद ललित ने पीएच श्रेणी में साल 2018 में यूपीएससी सीएसई परीक्षा पास की और साल 2019 बैच के आईएएस बने. जुझारू प्रवृत्ति के ललित इस सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता और उन राइटर्स को देते हैं जो बचपन से उनके लिए स्क्राइब बने यानी वे जो उनके लिए पेपर लिखते थे. यूं तो ललित का पूरा जीवन ही संघर्ष भरा है क्योंकि वे शरीर के एक बहुत महत्वपूर्ण अंग आंखों के बिना जिंदगी गुजार रहे हैं, फिर भी उनके जीवन की कुछ महत्वपूर्ण झलकियां आज हम आपसे शेयर करेंगे. अपने इस सफर को ललित ने दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिए इंटरव्यू में शेयर किया.

जन्म से नहीं थी यह समस्या –

ललित का जन्म एक आम बच्चे की ही तरह हुआ था लेकिन क्लास वन से उन्हें देखने में दिक्कत होने लगी. यह एक मेडिकल कंडीशन थी जिसमें धीरे-धीरे आंखों की रोशनी चली जाती है. क्लास 6वीं तक आते-आते ललित को अपने एग्जाम खुद लिखने में समस्या होने लगी थी और क्लास 8 से उन्होंने स्क्राइब लेना आरंभ कर दिया. एक बच्चे और उसके मां-बाप के लिए यह एक बहुत बड़ा झटका था पर सलाम है ललित के पैरेंट्स को कि उन्होंने ललित की इस फिजिकल डिसएबिलिटी को ऐसे स्वीकारा जैसे कुछ हुआ ही न हो और अपने बच्चे में भी इतना कांफिडेंस इतनी पॉजटिविटी भरी की लाइफ लांग ललित ने इसका रोना नहीं रोया. सच को स्वीकार किया और निरंतर आगे बढ़ते रहे. वे कहते भी हैं कि वे आज जो भी हैं अपने मां-बाप की वजह से उनके संघर्ष की वजह से और सबसे बढ़कर कभी गिवअप न करने वाले एटिट्यूड की वजह से हैं.

देखें  ललित द्वारा दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिया गया इंटरव्यू

हमेशा सामान्य स्कूल में पढ़ाया –

ललित को उनके पैरेंट्स ने हमेशा एक सामान्य स्कूल में और बच्चों के साथ ही पढ़ाया और कभी स्पेशल नीड्स वाले स्कूल में भर्ती नहीं किया. वे चाहते थे कि ललित बचपन से ही मेन स्ट्रीम कांपटीशन फेस करें और उसके लिए खुद को तैयार करें. हालांकि इस फैसले को बरकरार रखने में ललित के पिता को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता था पर वे अपनी बात पर अडिग रहते थे कि ललित पढ़ेंगे तो सामान्य स्कूल में ही.

ललित के पिता की रेलवे में सरकारी नौकरी थी जिसमें हर तीन-चार साल में उनका ट्रांसफर हो जाता था. वे जैसे-तैसे एक स्कूल में उनका एडमिशन कराते थे तब-तक नया स्कूल तलाशने का वक्त आ जाता था. लेकिन ललित के पिता ने कभी समझौता नहीं किया और हमेशा उन्हें एक नॉर्मल बच्चों के स्कूल में ही पढ़ाया.

स्कूल नहीं देते थे एडमिशन –

ललित की स्पेशल नीड्स देखकर अक्सर स्कूल वाले उन्हें लेने से मना कर देते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे उनकी स्पेशल जरूरतें पूरी नहीं कर पाएंगे. ललित ने पहले तो सेंट्रल स्कूल से पढ़ाई की फिर हायर एजुकेशन के लिए माता-पिता के साथ दिल्ली चले गए. इस बीच जहां-जहां उनके पापा का ट्रांसफर हुआ ललित के स्कूल बदलते रहे. ललित के दिल्ली जाने के पीछे भी एक कहानी है. उनके पिता को पता चला कि वहां पर ऐसे स्टूडेंट्स के लिए हर मायने में ज्यादा सुविधाएं हैं तो उन्होंने अपनी चीजों से समझौता किया और दिल्ली शिफ्ट हो गए.

विडंबना यह है कि वे स्कूल जिन्होंने कभी ललित को लेने से मना किया था आज आईएएस बन जाने के बाद बांहे फैलाए उनके इंतजार में बैठे रहते हैं, उनसे उनके नोट्स मांगते हैं. ललित भी जीवन के इस रूप को देखकर मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते.

माता-पिता बने संबल –

बचपन से लेकर बड़े तक ललित के पैरेंट्स ही उनके ट्यूटर रहे. वे ही ललित को पढ़कर मैटीरियल सुनाते थे और तैयारी करवाते थे. ललित की मां का उनके जीवन में खास रोल है क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही ललित की शिक्षा पर न्यौछावर कर दिया और हाइली क्वालीफाइड होने के बावजूद कभी जॉब नहीं कि ताकि ललित को पढ़ा सकें. पिता को भी जब समय मिलता था वे ललित के लिए पढ़ने का काम करते थे. ललित की यूपीएससी तक की पढ़ाई ऐसे ही हुई है.

स्कूल के समय तो ललित को स्क्राइब मिलने में भी बहुत दिक्कत होती थी क्योंकि उस उम्र के बच्चे बस खेलने और अपनी पढ़ाई करने पर फोकस्ड रहते हैं. हालांकि उन्हें जीवन में कुछ अच्छे लोग भी मिले जिनकी मदद से ललित की पढ़ाई पूरी हुई.

यूपीएससी के समय मां ने की बहुत मदद –

यूपीएससी की तैयारी के समय ललित को बहुत समस्याएं आयी. पहले तो मैटीरियल ही नहीं मिलता था, वे जैसे-तैसे ऑडियो बुक्स अरेंज करते थे. फिर जिस लेवल की तैयारी की आवश्यकता है वह किसी और की मदद से करना खासा मुश्किल काम है. लेकिन क्या ललित और क्या ललित की मां दोनों के जज्बे को सलाम करना होगा. दोनों ने कभी हार नहीं मानी और दिन-रात एक करके पढ़ाई की. ललित कहते हैं कि प्री के समय जब वे प्रैक्टिस करते थे तो पहले मां सारे प्रश्न पढ़कर सुनाती थी जिनके आंसर समय के अंदर ललित देते थे और बाद में उनकी मां उत्तर भी बताती थी. सात से आठ घंटे लगातार बोलते-बोलते उनकी मां की आवाज चली जाती थी पर उन्होंने कभी उफ्फ नहीं की. पानी पिया, कॉफी पी और फिर काम पर लग गई.

कुछ साथियों को देते हैं ललित अनेकों धन्यवाद –

ललित इस पूरे सफर में अपने उन दोस्तों का धन्यवाद करना नहीं भूलते जो एक नहीं दो बार उनके स्क्राइब बने. ललित का सेलेक्शन दूसरी बार में हुआ, पहली बार में वे चयनित नहीं हुए थे. ऐसे में दो-दो बार मुख्य परीक्षा लिखने के लिए किसी को तलाशना और उसके साथ तारतम्य बैठाना आसान नहीं होता. प्री में तो खाली टिक करना होता है लेकिन मेन्स में जमकर लिखना होता है. ऐसे में जिन लोगों ने ललित की सहायता की उनके लिए वे बहुत आभार महसूस करते हैं. ये लोग मुख्य परीक्षा के पहले ललित के साथ अभ्यास करने भी आते थे.

अंत में ललित यही कहते हैं कि जीवन में अगर गोल और नियत साफ हो तो कुछ भी कठिन नहीं. फिजिकल डिसएबिलिटी कुछ नहीं होती और उन जैसे डिसएबल लोग उन नॉर्मल लोगों से कहीं बेहतर हैं, जिनके जीवन में न कोई लक्ष्य होता है न उसे पाने की जद्दोजहेद. मन में ठान लें तो कोई भी चुनौती आपके हौसले को नहीं डिगा सकती और आप मंजिल तक जरूर पहुंचते हैं.

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